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बॉलीवुड के अनकहे किस्से: ऐसे पूरी हुई थी फिल्म दिल अपना और प्रीत पराई…


किशोर साहू अपने जमाने के मशहूर नायक, निर्माता, निर्देशक और पटकथा लेखक थे। वर्ष 1937 से 1980 तक उन्होंने 22 फिल्मों में अभिनय और 20 फिल्मों का निर्देशन किया। सिंदूर, साजन, गृहस्थी, औरत, तीन बहू रानियां, घर बसा के देखो, पूनम की रात, हरे कांच की चूड़ियां, पुष्पांजलि और दिल अपना और प्रीत पराई, उनके द्वारा निर्देशित कुछ उत्कृष्ट फिल्में थीं। आज की पीढ़ी उन्हें फिल्म गाइड में वहीदा रहमान के पति मार्को के रूप में जानती है। किशोर साहू एक समय अपनी कुछ फिल्मों की असफलता से बड़ी मुश्किल में थे। काम की तलाश में खुद की लिखी एक फिल्म की स्टोरी जो एक अस्पताल के डॉक्टर और नर्स की प्रेम कहानी थी, को लेकर वे कमाल अमरोही के पास गए। वे नर्स का रोल मीना कुमारी से कराना चाहते थे। कहानी सुनने के बाद कमाल अमरोही ने कहा कि वह यह फिल्म खुद प्रोड्यूस करेंगे और निर्देशन उनका यानी किशोर साहू का रहेगा। किशोर साहू तैयार हो गए। किशोर हीरो के रूप में दिलीप कुमार को लेना चाहते थे। कमाल साहब पहले तो तैयार हो गए फिर उनसे अपनी अनबन की बात कहकर मना कर दिया। अशोक कुमार, राजेंद्र कुमार और शम्मी कपूर के नाम भी मना हो गए। इस बीच 20 जून 1958 को फिल्म का मुहूर्त कर शूटिंग शुरू कर दी गई। फिल्म का नाम रखा गया- दिल अपना और प्रीत पराई।

उधर, कमाल अमरोही ने राजकुमार को हीरो ले लिया। किशोर साहू को बुरा लगा लेकिन क्या किया जा सकता था। जब फिल्म खत्म होने की कगार पर थी तो कमाल अमरोही ने फिल्म का ट्रायल शो रखने की बात कही। ट्रायल शो में संगीत निर्देशक शंकर जयकिशन, गीतकार शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मीना कुमारी, राजकुमार, नादिरा एवं कमाल अमरोही उपस्थित थे। कमाल अमरोही को फिल्म पसंद नहीं आई। क्या कमी है इस पर उनका कहना था, “पिक्चर ढीला और बोरिंग है। बिना डायलॉग के जगह-जगह साइलेंट सीनों से बोरियत और बढ जाती है।” उन्हें मीना कुमारी के अस्पताल के गलियारे में पीछे से लिए गए शाटों पर भी एतराज़ था। सुधार के नाम पर वे 14-15 सीन और शूट करना चाहते थे जिस पर किशोर तैयार न थे। उनका तर्क था इससे तो फिल्म की कहानी ही बदल जाएगी।

कमाल साहब ने राजकुमार और नादिरा को चुपके से बुलाकर कुछ सीन शूट करना चाहे लेकिन वे लोग तैयार नहीं हुए। फिल्म अटक गई। एक दिन उनके पास के. आसिफ साहब का फोन आया कि वह उनसे मिलना चाहते हैं। किशोर साहू जब उनके स्टूडियो उनसे मिलने पहुंचे तो उसे बिल्कुल उजड़ा और गंदा पाया।आसिफ साहब खुद दाढ़ी बढ़ाए गंदे कुर्ते पजामें में बैठे थे। पूरे कमरे में सिगरेट के टुकड़े और उसकी राख फैली हुई थी। मुगले आज़म जैसी महंगी और कलात्मक फिल्म बना चुके आसिफ उस समय उन्हें फकीर जैसे लगे लेकिन इसी फकीर ने दोनों को आमने-सामने बैठाकर बात करवाई। फ़िल्म की असफलता से घबराए कमाल अमरोही इस शर्त पर तैयार हुए कि वे अपना नाम प्रोड्यूसर के रूप में न देकर अपने प्रोडक्शन मैनेजर और मीना कुमारी के सेक्रेटरी बाकर का नाम देंगे। 29 अप्रैल 1960 को फिल्म रिलीज़ हुई और उसने सिल्वर जुबली मनाई।

चलते चलते: फिल्म के प्रीमियर के दौरान कमाल अमरोही ने किशोर साहू से शर्त लगाई थी कि अगर यह फिल्म सिल्वर जुबली हुई तो वह उनको एक कार गिफ्ट देंगे। सिल्वर जुबली के बाद एक दिन उन्होंने कमाल अमरोही को फोन कर उनका वादा याद दिलाया तो उनका टका सा जवाब था- गिफ्ट दिया जाता है, मांगा नहीं जाता। मैं दूंगा लेकिन अपनी मरजी से दूंगा, लेकिन वह दिन कभी नहीं आया। हां कमाल साहब ने एक कमाल और किया था। फिल्म के हिट होते ही शहर भर में लगे पोस्टरों और बैनरों पर निर्माता की जगह उन्होंने रातों-रात अपना नाम लिखवा दिया था।