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शैव धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है छत्तीसगढ़ का सिसदेवरी


रायपुर, 08 जुलाई (हि.स.)। छत्तीसगढ़ अनेक पुरातात्विक अवशेषों से भरा पड़ा है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यह अपने महत्व को लेकर अछूता ही रहा है।

रामगढ़ में सीता बेंगरा एवं जोगीमारा की गुफाएं, मल्हार से प्राप्त चतुर्भुजी विष्णु प्रतिमा, देवरानी जेठानी मंदिर ताला का स्थापत्य, ईटों से निर्मित सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर यहां की कला परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। महानदी के तट पर स्थित राजिम, आरंग, सिरपुर, नारायणपुर, खरौद- शिवरीनारायण प्राचीन कला केंद्र के रूप में जाने जाते हैं। इसी क्रम में सिसदेवरी भी है। जहां वर्ष 2002- 2003 में उत्खनन कार्य किया गया था। यहां से प्राप्त कलाकृतियां प्रतिमा विज्ञान के विशिष्ट शैली की मिसाल के रूप में जानी जाती हैं। सिसदेवरी के टीले के उत्खनन से लगभग छठवीं सदी ईस्वी के अवशेष प्रकाश में आए, जो सोमवंशी कला शैली से पूर्व दक्षिण कोसल के शरभपूरीय कला शैली के परिचायक है।

सिसदेवरी राजधानी रायपुर के पलारी तहसील के अंतर्गत उत्तर तथा पूर्व के मध्य स्थित है। यह स्थल महानदी के बाएं कछार पर स्थित है तथा राजिम से सिरपुर शिवरीनारायण- खरौद जाने वाली महानदी के तटवर्ती प्राचीन स्थल मार्ग में शैव धर्म के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थित रहा है। छिछोरी से प्राप्त अवशेषों से इसके संप्रदाय के कला केंद्र के रूप में पुष्टि होती है। सिसदेवरी का समान अर्थ ‘शिव का देवालय’ है।

सिसदेवरी उत्खनन के निदेशक रहे जीएल रायकवार के अनुसार यहां के टीले का अन्वेषण वर्ष 1994 में किया गया था। इसके उत्खनन के लिए वर्ष 2001-2002 मैं प्रस्ताव तैयार कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली को भेजा गया था। अनुमति मिलने के बाद 11 जनवरी, 2002 से उत्खनन कार्य शुरू किया गया। सिसदेवरी स्थित भग्नावशेष ईंट तथा पत्थरों से निर्मित संरचना रही है। गांव के बीच में स्थित होने के कारण ग्रामीणों के द्वारा इस स्थान को समय-समय पर नष्ट किया जाता रहा ,जिसकी वजह से कई पुरातात्विक अवशेष नष्ट भी हुए। इसके उत्खनन से दक्षिण कौशल की स्थापत्य कला तथा मूर्ति विज्ञान के नवीन पक्षों का पता चला है।

उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से इसके चार संप्रदाय के कला केंद्र के रूप में पुष्टि होती है। यह पुरातात्विक स्थल भग्नावशेष नीति तथा प्रस्तर निर्मित संरचना रही है।जब सिसदेवरी के टीले का उत्खनन किया गया तो वहां एक प्राचीन शिव मंदिर निकला, जिसका अधिकांश भाग क्षतिग्रस्त था। यह मंदिर ईंट और पत्थरों से निर्मित था। उत्खनन कार्य में मंदिर का पात्रों निर्मित मंडप, सोपान तथा गर्भ गृह का अवशेष मिला है। मंडप तथा सोपान पत्थरों से निर्मित है। यह तीन तरफ से पकी हुए ईटों से निर्मित अधिष्ठान से पूर्व, उत्तर एवं दक्षिण दिशा की ओर घिरा हुआ था जबकि मंदिर का मुख पश्चिम दिशा की ओर है। यहां उत्खनन से प्राप्त अर्धनारीश्वर की भग्न प्रतिमा, स्तंभ अलंकरण तथा प्रतिमा अधिष्ठान में मकर -ताला के कला शैली से प्रभावित है। यहां की संरचना में ईंट तथा पत्थर का उपयोग साथ-साथ किया गया है। हालांकि प्राप्त शिव मंदिर में शिवलिंग तथा नंदी नहीं मिले हैं।

यहां मिली खंडित प्रतिमाएं अत्यंत कलात्मक हैं। यहां मिले अवशेषों में अत्यंत सूक्ष्म कलात्मक अलंकरण किया गया है तथा चेहरों पर तीव्र भावों की अभिव्यक्ति है। कला शैली की दृष्टि से देवरी के मंदिर का निर्माण कॉल छठवीं शताब्दी ईस्वी का उत्तरार्ध अर्थात 550 से 600 ईस्वी के मध्य का अनुमान लगाया गया है। पुरातत्व विभाग से जुड़े तथा इसके उत्खनन कार्य में संलग्न रहे पुरातत्वविद राहुल सिंह बताते हैं कि यहां के उत्खनन से प्राप्त संरचना दक्षिण कौशल के प्रारंभिक स्थापत्य कला की निरंतरता को क्रमबद्ध करने में एक सहायक आधार सिद्ध हुआ है। यह मंदिर अज्ञात कारणों से नष्ट होने के पश्चात टीले में परिवर्तित हो गया था। इसके पश्चात ग्राम वासियों द्वारा इसे कई बार खोदा गया, जिसकी वजह से कई अवशेष नष्ट भी हो गए।

छत्तीसगढ़ के स्थापत्य कला में पहली मिसाल के रूप में देवरानी जेठानी मंदिर के पश्चात सिसदेवरी का स्थान सिद्ध होता है। इसके पश्चात मल्हार स्थित देवी मंदिर का क्रम स्थापित किया जा सकता है। पुरातत्वविद मानते हैं कि सिसदेवरी का निर्माण कार्य शरभपुुरीय राजाओं के राजत्व काल का समय माना जाना चाहिए। यहां के मिले मंदिर के स्थापत्य विलक्षणता में मंडप, अंतराल तथा गर्भगृह का निर्धारण अत्यंत जटिल रहा है। समझा जाता है कि पूर्व में इस टीले को ग्राम वासियों के द्वारा खोदकर तल विन्यास के साथ-साथ ऊपर का विन्यास भी नष्ट कर दिया गया। आश्चर्यजनक बात यह है कि इस टीले के उत्खनन से एक भी लघु, पूरा अवशेष मिट्टी के बर्तन तथा प्राचीन सिक्के नहीं मिल सके। सिर्फ 11 से 12 ग्राम का वर्ष 874 का महारानी विक्टोरिया का चांदी का एक रुपये का सिक्का मिला है।

यहां उत्खनन में लाल बलुआ पत्थर से निर्मित 29 स्थापत्य खंड मिले हैं। इसमें लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित निर्मित कलात्मक हारवाली अलंकार युक्त खंडित शिल्पकृति, अष्टदल पुष्पी अलंकरण युक्त खंडित भाग, किसी नारी प्रतिमा के शुरू भाग पर प्रदर्शित आम्रकुंज तथा पल्लव अलंकरण युक्त अलंकृत शिल्प खंड, पुष्प तथा रुद्राक्ष अलंकृत शिल्पकृति का टुकड़ा, कई अर्ध गोलाकार स्तंभ सदृश्य अलंकरण, पुष्पीय अरावली पकड़े हुए किसी नारी प्रतिमा का खंडित हाथ, मयूरा अरुण कार्तिकेय के अंकन युक्त कलात्मक भुजबंद, किसी देव पुरुष का शीर्ष भाग, अर्धनारीश्वर का शीर्ष भाग, मध्य भाग, अर्धनारीश्वर प्रतिमा का अधिष्ठान, एक पुरुष प्रतिमा, भार वाहक गण तथा दो द्वार शाखा के भाग मिले हैं। एक पर नारी का बायां हाथ बना हुआ है। यह स्वीकार किया जा सकता है कि देवरानी जेठानी मंदिर बिलासपुर के पश्चात दक्षिण कौशल में स्थापत्य कला की अगली श्रृंखला सिसदेवरी का मंदिर रहा है।