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उप्र: मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटी कांग्रेस-सपा-बसपा


लखनऊ, 18 जुलाई(हि.स.)। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। इसे लेकर सभी पार्टियां अपने-अपने वोट बैंक को सहजने में जुटी हुई हैं। जहां भारतीय जनता पार्टी सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास के मूलमंत्र को लेकर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस-सपा तथा बसपा अपने परम्परागत जातीय वोटबैंक के साथ मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर लुभाने में जुटे हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा और बसपा अध्यक्ष मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों के माध्यम से इस मुहिम को रंग देना शुरु किया है।

समाजवादी पार्टी(सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के मैंगोमैन कलीमउल्लाह के घर जाने के बाद मुस्लिम समाज में उत्साह है। बकरीद के पहले अखिलेश यादव की इस यात्रा को मुस्लिम व्यापारियों ने सिराखों पर लिया है। कलीमउल्लाह की अखिलेश के सिर पर हाथ रखकर आगे बढ़ाने वाली फोटो को सोशल मीडिया पर खासा पसंद किया गया है।

समाजवादी पार्टी में मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ने के लिये अहमद हसन को मुख्य रुप से जिम्मेदारी दी है। इसके अलावा मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध वर्ग के लोगों, धर्मगुरुओं से सपा अध्यक्ष स्वयं ही वार्ता कर रहे हैं। इस काम में पार्टी में मुख्य रणनीतिकार की भूमिका निभाने वाले महासचिव रामगोपाल यादव भी जुट गये हैं। नावेद सिद्दकी को सोशल मीडिया पर सक्रिय मुस्लिम युवाओं को जोड़ने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी है।

उत्तर प्रदेश में तीन दिन के दौरे पर आयी कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा ने मुस्लिम समाज को संदेश देने के लिये ही नसीमुद्दीन सिद्दकी के आवास पर गयीं। कांग्रेस महासचिव अपने इस कदम से मुस्लिम समाज में बड़ा संदेश देने में सफल हुई हैं। हजरतगंज में प्रदेश सरकार के विरुद्ध धरना भी मुस्लिम समाज को खासा पसंद आया है।

वहीं मुस्लिम चेहरों को बसपा के पार्टी हेडक्वाटर बुलाकर अध्यक्ष मायावती सीधे संवाद कर रही हैं। पूर्वांचल और पश्चिम उत्तर प्रदेश की मुस्लिम बहुल्यता वाली सीटों के अनुसार मंडल पदाधिकारियों को लगाया गया है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में कृषि कानून, गन्ना मूल्य जैसे मुद्दों को भी बसपा पदाधिकारी उठा रहे हैं।

प्रदेश सरकार के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के विरुद्ध चल रही कार्रवाई से पूर्वांचल की हवा भी बदली है। बदले माहौल का फायदा उठाने के लिये बसपा के नेताओं ने इसे पूर्वांचल में जोरशोर से उठाना शुरु कर दिया है। पूर्वांचल में जिन जनपदों में इसका सबसे ज्यादा प्रभाव है, उसमें वाराणसी सबसे पहले स्थान पर है और जहां पर कुल मुस्लिम आबादी 15.85 प्रतिशत है। इसी तरह मऊ में 23 प्रतिशत, गाजीपुर में 14 प्रतिशत और आजमगढ़ में 28 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा में से 130 विधानसभाओं में मुस्लिम मतदाता जीत हार के फैसले में अहम भूमिका निभाते हैं। बीते विधानसभा चुनाव 2017 में भाजपा ने 403 सीटों पर हुये चुनाव में 324 सीटें जीती थी। जहां मुस्लिम बहुल्य विधानसभा सीटों पर भी कम अंतर से ही सही भाजपा ने जीत दर्ज करायी थी। तब मुस्लिम मतदाताओं के सामने विकल्प की कमी थी और उनके मत प्रतिशत हर जगह पर बंट गये थे।

उत्तर प्रदेश में वर्तमान योगी सरकार के एनआरसी विरोधियों के पोस्टर लगवाने, आजम खान के विरुद्ध कार्रवाई कराने के बाद से माहौल बदला हुआ है। मुस्लिम संगठनों की एक साथ बैठकें होने लगी हैं। योगी के खिलाफ मुनव्वर राणा जैसे चेहरों के बयान आये दिन सामने आ रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से भाजपा को बेदखल करने के लिए मुस्लिम मतदाता उसी को वोट देगा, जो भाजपा का विकल्प बनेगा।