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डीआरडीओ चीफ बोले- मिसाइल तकनीक में भारत पूरी तरह से ‘आत्मनिर्भर’ हुआ


समृद्ध और ‘आत्मनिर्भर’ बनने के लिए उन्नत तकनीक पर काम करने की जरूरत

 वैज्ञानिकों की बदौलत उन्नत मिसाइल प्रणालियों के विकास को नई ऊंचाइयां मिलीं



नई दिल्ली, 22 सितम्बर (हि.स.)। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के अध्यक्ष जी. सतीश रेड्डी ने मंगलवार को कहा कि भारत ने मिसाइल प्रौद्योगिकी में ‘पूर्ण आत्मनिर्भरता’ हासिल कर ली है। सबसे उन्नत मिसाइलों को अब देश में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी देश को समृद्ध और ‘आत्मनिर्भर’ बनना है, तो उसे उन्नत तकनीक पर काम करने की जरूरत पड़ेगी और इसमें शैक्षणिक संस्थानों की अहम भूमिका होगी।

डीआरडीओ अध्यक्ष मंगलवार को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की ओर से आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। जेएनयू ने ‘भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रक्षा प्रौद्योगिकी’ पर व्याख्यान का आयोजन किया था। विश्वविद्यालय के कुलपति एम. जगदीश कुमार, कई संकाय और छात्र भी ऑनलाइन कार्यक्रम में शामिल हुए। रेड्डी ने डीआरडीओ के विकास में 1980 और 90 के दशकों को याद करते हुए भारत के ‘मिसाइल मैन’ पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम सहित वैज्ञानिकों की भूमिका को सराहा, जिन्होंने मिसाइल प्रौद्योगिकियों पर काम किया। इन्हीं वैज्ञानिकों की बदौलत मिसाइल की उन्नत प्रणालियों और प्लेटफार्मों के विकास को नई ऊंचाइयां मिलीं।

उन्होंने एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (आईजीएमडीपी) के तहत विकसित की गईं पांच स्वदेशी मिसाइलों पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग का उल्लेख किया। अग्नि मिसाइल की तकनीक ने देश को मिसाइल प्रौद्योगिकी में आगे का रास्ता दिखाया। उन्होंने कहा कि अब भारत बैलिस्टिक मिसाइलों वाले देशों के एक चुनिंदा क्लब में शामिल हो गया है, जो दुश्मन की मिसाइल को रोक सकते हैं और उसे मार सकते हैं। इसके अलावा हमारे पास लंबी दूरी की अधिक क्षमताओं वाली कई और मिसाइलें हैं। रेड्डी ने कहा आज मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हमारे पास मिसाइल प्रौद्योगिकी में ‘पूर्ण आत्मनिर्भरता’ है और हम देश में सबसे उन्नत मिसाइलों का विकास कर सकते हैं।

जी. सतीश रेड्डी ने मार्च, 2019 में किए गए एंटी-सैटेलाइट (ए-सैट) परीक्षण के बारे में बात करते हुए कहा कि भारत ने इस जटिल क्षमता का प्रदर्शन करने के साथ ही ए-सैट मिसाइल के साथ अंतरिक्ष में अपने एक उपग्रह को मार गिराया। इसके बाद भारत भी अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के कुलीन क्लब में शामिल हो गया, जिनके पास पहले से ही ऐसी क्षमताएं हैं। उन्होंने विभिन्न आईआईटी में बने उत्कृष्टता केंद्रों और छात्रों को डीआरडीओ में जूनियर रिसर्च फेलो और सीनियर रिसर्च फेलो के रूप में काम करने के अवसरों के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्र में डीआरडीओ कुछ क्षेत्रों में काम कर रहा है, जिनमें ड्रोन रोधी प्रणाली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), साइबरस्पेस, सुरक्षित प्रणालियां और संचार शामिल हैं।