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मेवाड़ में चांदी के प्राचीन खनन पर गहन शोधकार्य लिख सकते हैं मानव विकास की नई कहानी


विश्व विरासत सप्ताह 19-25 नवम्बर पर विशेष

डॉ. ललित पाण्डेय

राजस्थान ही नहीं अरावली पर्वत श्रृंखला का भारतीय इतिहास के निर्माण में भी महती योगदान रहा है। अनेक विद्वानों ने तो अरावली पर्वत श्रृंखला को मेवाड़ के राजस्थान की संज्ञा तक प्रदान की है और यह मंतव्य तक दे दिया है कि उत्तर भारत के मैदान की संस्कृति के निर्माण में जो योगदान हिमालय का रहा है, किसी भी दृष्टि से अरावली कमतर नहीं।

अरावली की अनवरत पर्वत श्रृंखला ने मेवाड़ को एक विशिष्ट भू आकृति के साथ ही विशिष्ट जल प्रणाली भी प्रदान की है। साथ ही, इस भूभाग के मौसम को भी इस प्रकार नियंत्रित कर बसावट के लिए अनुकूल बना दिया जिसके कारण मेवाड़ में जब मानव ने प्रवेश किया तो उसने उक्त भूभाग को अपना स्थायी घर बना लिया। आश्चर्यजनक रूप से इस विशेषता को पाषाण काल से लेकर आधुनिक समय तक अनुभव किया जा सकता है कि मेवाड़ में जन समुदाय ने बाह्य भौगोलिक भागों से प्रवेश अधिक किया और यहां से निर्गमन उसकी तुलना में नगण्य ही हुआ। संभवतः इसी कारण यह कहावत भी बन गयी कि- गेहूं छोड़ मक्का खाणों, मेवाड़ छोड़ कहीं नी जाणो।

राजस्थान की धरा और उसमें भी मेवाड़ ने प्रारंभ से ही देशी-विदेशी सभी जनों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस कारण उन्होंने इसके इतिहास, भूगोल और संस्कृति को अपने लेखन का विषय बनाया। ऐसे ही एक सुप्रसिद्ध बांग्ला विद्वान डीएल रे ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘मेवाड़ का पतन’ में मेवाड़ की अरावली उपत्यकाओं के सौंदर्य का चित्रण करते हुए लिखा,

ओ! मेवाड़ के पर्वतों,

ओ! मेवाड़ के पर्वतों,

जो अपनी उत्तंग उत्तरी चोटियों से,

नीलम के समान दीप्त आभा लिए,

वर्ष पर्यंत अथाह जल राशि को गर्भ में लिए,

नदी श्रृंखला का रूप ले सुमधुर संगीत से ओतप्रोत हो प्रवाहित हो रही हैं।

ऐसे अलंकरणों से सुसज्जित अरावली पर्वत श्रृंखला को रत्नगर्भा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। इसने मेवाड़ को विभिन्न रूप में अकूत संपदा दी है जो एक ओर तो फाइलाइट, माइकासिस्ट और क्वार्टजाइट की खानों के रूप में है तो दूसरी ओर इसके गर्भ में सीसा, जस्ता, तांबा, लोहा, गार्नेट, अभ्रक, एस्बेस्टस, फॉस्फेट, सोप स्टोन, क्लोराइट और बेराइल दिया है जो आज भी समूचे राजस्थान के राजस्व का प्रधान स्रोत हैं।

मेवाड़ की प्राचीन जस्ता खानों के महत्व से सभी परिचित हैं और इसकी जानकारी प्रदान करने का गौरव हिंदुस्तान जिंंक लिमिटेड, एमएस यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा, वडोदरा तथा ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन को जाता है जिसमें तत्कालीन उच्च प्रबंधक- अभियंता एचवी पालीवाल और ललित गुर्जर वरिष्ठ विज्ञानी का महत्वपूर्ण योगदान था। इस खोज ने जावर (मेवाड़) खदान के प्राचीनतम होने की पुष्टि कर मेवाड़ का नाम राजस्थान, भारत और विश्व में बढ़ाया था। यह खानें मध्यकाल के उत्तरकाल तक मेवाड़ की समृद्धि का प्रमुख स्रोत थीं तथा इनका मेवाड़ के वीर हिंदूआ सूर्य के नाम से विख्यात महाराणाओं की उपलब्धियों के अर्जन में भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। लेकिन, मेवाड़ की अन्य खानों राजपुरा – दरीबा और रामपुरा -अगूचा के महत्व की जानकारी कम ही लोग जानते हैं।

सन 2013 में लंदन से प्रकाशित शोध पत्रिका ‘‘टेक्नीकल रिसर्च बुलेटिन’’ के सातवें अंक में प्रकाशित पीटी क्रेड्डॉक एट. एल. के अध्ययन से पता चलता है कि प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य भाग से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई थी जो इस महाद्वीप का सर्वाधिक विशाल और शक्तिशाली राजवंश था। इस वंश के शासकों ने बहुत बड़े पैमाने पर चांदी के सिक्के जारी किए थे जिनको आहत अथवा कार्षापण कहा जाता था। यह वह काल था जब विश्व के अनेक शासकों ने चांदी के सिक्के जारी किए थे। इसके लिए भूमध्यसागरीय क्षेत्र और यूनान से चांदी उपलब्ध होती थी, जहां चांदी के विशाल भंडार थे।

भारत में चांदी के संदर्भ में यह मान्यता थी कि यहां चांदी बर्मा, अफगानिस्तान और ईरान से आती थी, लेकिन गत दशकों में ब्रिटिश और भारतीय वैज्ञानिक दुःसाध्य खोज के बाद मेवाड़ के संदर्भ में भी मान्यताएं बदली हैं। पहले यह माना जाता रहा कि दक्षिणी राजस्थान अथवा मेवाड़ प्राचीन काल में एक दुर्गम और अज्ञात स्थान था और भारतीय इतिहास के महाजनपद काल और प्रथम भारतीय साम्राज्य मौर्यों के समय राजस्थान के दक्षिणी भाग मेवाड़ में अरावली की दुरूह पर्वत श्रृंखलाओं तक मौर्य शासकों की पहुंच नहीं थी।

लेकिन, गत दशकों में दरीबा और अगूचा पर हुए शोध से यह ज्ञात हुआ है कि उक्त दोनों क्षेत्रों ने जस्ता आदि धातुओं के स्थान पर एक निश्चित प्रयोजन के लिए केवल चांदी का ही दोहन किया। इसका खनन एवं प्रगलन दोनों ही दुरूह थे। अतः निश्चित रूप से इस समस्त गतिविधि को एक सशक्त प्रशासनिक व्यवस्था और उच्चस्तरीय धातु विज्ञान के बिना करना संभव नहीं था और यह दोहन निश्चित रूप से मौर्य शासकों द्वारा ही किया गया था जिसकी पुष्टि कार्बन-14 तिथि से भी होती है।

मौर्यकालीन प्रख्यात नीतिज्ञ कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र के साथ अर्थशास्त्र के द्वितीय अधिकरण के बारहवें अध्याय में खनन प्रविधि पर विस्तार से लिखते हुए यह विचार व्यक्त किया है कि किस प्रकार इस विभाग के प्रमुख को इस दुरूह कार्य को करना चाहिए। इसी अध्याय में लिखा है कि ‘कोष का प्रधान स्रोत खानें हैं और सुदृढ़ कोष से ही सुदृढ़ सेना का निर्माण संभव है और कोष और सेना के शक्तिशाली होने से राजा पृथ्वी पर अधिकार करता है अर्थात कोष राज्य का आभूषण है।’

अतः यह लगभग निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इतनी सक्षम व्यवस्था केवल मौर्यों के समय ही संभव थी और उन्हीं के द्वारा की गई थी। इसकी बहुत अधिक संभावना बनती है कि मेवाड़ के इस अंचल में गिरनार के प्रांतपाल के नेतृत्व में ही यह कार्य संचालित हो रहा होगा। इस तरह के मत की पुष्टि क्रैड्डेक एट. एल. पुरा धातु विज्ञानियों द्वारा अपने शोधपत्र के शीर्षक ‘चांदी दोहन की सुगम परिष्कृत प्रविधि’ से भी होती है।

पुराविदों का यह मत है कि पुरातात्विक शोध से लगभग अछूते रहे दरीबा और अगूचा क्षेत्र में ऐसे स्थलों की यदि जानकारी आती है जहां खनन और प्रगलन के प्राचीन अवशेष मौजूद हों, तब वहां शोधकर्ताओं को शोध के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे मेवाड़ की प्राचीन समृद्धता की परतें मानव विकास की और नई कड़ियों को जोड़ सकेंगी।

(लेखक राजस्थान विद्यापीठ साहित्य संस्थान के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ पुरातत्वविद् हैं।)