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सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को संगीत, कला, साहित्य साधकों ने याद किया


-लोकनायक जयप्रकाश राष्ट्रीय कला और संस्कृति प्रतिष्ठान का आयोजन

मुंबई, 21 फरवरी (हि.स.)। लोकनायक जयप्रकाश राष्ट्रीय कला और संस्कृति प्रतिष्ठान के मंच से पांच दिवसीय ऑनलाइन श्रद्धांजलि व्याख्यानमाला में अनेक प्रसिद्ध लेखक, गायक, कलाकार और कला मर्मज्ञों ने सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को याद किया।

भारत रत्न लता मंगेशकर के जीवन के विविध पक्षों को याद करते हुए वक्ताओं ने उनके गायन को लोक संगीत के समकक्ष बताया तो, कई वक्ताओं ने उसे कला, संगीत और आध्यात्म का एकाग्र रूप कहा। प्रथम सत्र में कवि-आलोचक ध्रुव शुक्ल और लता मंगेशकर की ज्योतिष-परामर्शदात्री स्वामी ओमा द अक का वक्तव्य रहा। अगले सत्र में लताजी के समकालीन चित्रकार प्रभाकर कोल्ते ने लता मंगेशकर की आवाज को परमेश्वरी आवाज की संज्ञा दी। अगले व्याख्यान में कुमार गन्धर्व के पौत्र प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक पं. भुवनेश कोमकली ने लता मंगेशकर के कलात्मक व्यक्तित्व की तुलना हिमालय से की। चतुर्थ सत्र में ख्यात लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने लता मंगेशकर के अलग- अलग कलात्मक पक्षों को याद किया। उन्होंनेे लताजी के कई गानों को भी गुनगुनाया। इस क्रम में कथक नृत्य की शास्त्रीय परम्परा में युगल जोड़ी के लिए विख्यात नलिन कमलिनी में से आमंत्रित पद्मश्री नलिनी अस्थाना ने गीत, नृत्य, ताल और स्वर के विराट स्वरूप को संगीत के रूप में रेखांकित किया। छठवें सत्र में शास्त्रीय गायिका भूमिका द्विवेदी ने लता मंगेशकर को उनके अपने संगीत घराने भिंडी बाजार घराना से जुड़े गहरे सम्बन्ध पर अत्यंत रोचक प्रकाश डाला।

व्याख्यान की सातवीं कड़ी में प्रसिद्ध कवि, लेखक और कलाविद यतीन्द्र मिश्र ने अपनी लिखी किताब “लता सुर गाथा” के लेखन के दौरान लता मंगेशकर से हुई अपनी मुलाकातों के अनुभव को साझा किया। आयोजन का अंतिम वक्तव्य शास्त्रीय गायक और कलाविद् अप्रमेय मिश्र का हुआ। उन्होंने लता मंगेशकर की कला यात्रा को रेखांकित करते हुए उनके कालजयी स्वरूप के महत्व और कारणों पर विशेष प्रकाश डाला। दो अन्य सत्रों में प्रारम्भ और समापन के वक्तव्य हुए।

इस श्रद्धांजलि व्याख्यानमाला की अध्यक्षता प्रतिष्ठान के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. ज्योतिष जोशी और राष्ट्रीय सचिव प्रो दयाशंकर तिवारी ने किया। संस्था के सांस्कृतिक सचिव धर्मेंद्रनाथ ओझा के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. सविता निगम, कवि और साहित्यकार अनामिका शिव, गायक रूपेश पाठक और संस्था की कार्यकारिणी सदस्य और समन्वयक साधना राणा ने संचालन का दायित्व निभाया। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए प्रतिष्ठान के महासचिव अरविन्द ओझा ने कम समय में आयोजन की गरिमा का जिक्र किया।

ज्ञातव्य है कि लोकनायक जयप्रकाश राष्ट्रीय कला और संस्कृति प्रतिष्ठान का लक्ष्य जेपी की मान्यताओं और चिंताओं के अनुरूप समाज और संस्कृति को विकसित करना है। मासिक व्याख्यान, परिचर्चा, कला शिविर, कला मेला, कबीर यात्रा, ग्राम-संस्कृति-सर्वोदय जैसे अनेक महत्वपूर्ण काम निकट भविष्य में किए जाने हैं। इसके लिए देश के अग्रणी लेखकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों, नर्तकों, संगीतकारों, राजनीतिविद् और समाज से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों को जोड़ा जा रहा है।