Wed. Feb 21st, 2024

संसाधनों से परिपूर्ण झारखंड में अयोग्य सरकार: जयंत सिन्हा


रांची 22 फरवरी। भाजपा के हजारीबाग से सांसद व पूर्व केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने प्रदेश कार्यालय में प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए हेमन्त सोरेन सरकार पर अयोग्यता का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि झारखण्ड सरकार के स्वयं के बजट के अनुसार उनके पास वर्ष 2021-22 में खर्च करने के लिये लगभग ₹ 91,277 करोड़ की राशि है, जिसमें लगभग ₹39,942 करोड़ का योगदान केंद्र सरकार कर और ग्रांट के रूप में दे रही है। पिछले वर्ष की तुलना में केंद्र सरकार का योगदान 19.62 प्रतिशत बढ़ा है।

वहीं झारखण्ड सरकार के पास वर्ष 2020-21 में खर्च करने के लिये लगभग ₹ 90,007 करोड़ की राशि थी, जिसमें लगभग ₹33,389 करोड़ का योगदान केंद्र सरकार ने कर और ग्रांट के रूप में दिया। इसके अतिरिक्त झारखण्ड सरकार के पास वर्ष 2021 तक डीएमएफटी के अंतर्गत लगभग 7 हजार करोड़ रुपए की राशि थी।

इस साल मोदी सरकार ने पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान की घोषणा की है। इसके अंतर्गत झारखण्ड को 50 साल के लिये लगभग 1 लाख करोड़ रुपए तक का ब्याज मुक्त ऋण विकास कार्यों के लिये मिल सकता है।

यानी झारखण्ड सरकार के पास लाखों करोड़ों रुपए के अपार संसाधन हैं, लेकिन खर्च करने की सही नीयत नहीं है। इसलिए हम जनता की ओर से राज्य सरकार से पूछना चाहते हैं कि वो इन साधनों का क्या कर रही है?

*झारखण्ड सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन के कारण विकास की योजनाएं ठप*

जयंत सिन्हा ने कहा कि पिछले 5 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि झारखण्ड को लगभग 900 रुपए करोड़ का राजस्व घाटा उठाना पड़ा है। जो यह दर्शाता है कि झारखण्ड सरकार का वित्तीय प्रबंधन डामाडोल है। यही नहीं झारखण्ड पूरे देश में कैपिटल एक्सपेंडिचर में सबसे कम निवेश करने वाले राज्यों में से एक है। जहां हमारे पड़ोसी राज्य जैसे कि छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा अपने बजट का 19% कैपिटल एक्सपेंडिचर पर खर्च कर रहे हैं, वहीं झारखण्ड की कैपिटल एक्सपेंडिचर दर मात्र 17% है। जहां कोविड महामारी के समय दुनिया समेत देश के विभिन्न राज्य कैपिटल एक्सपेंडिचर को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि नए अस्पतालों का निर्माण किया जा सके, बेहतर सड़कें बनाई जा सकें, बच्चों को शिक्षा दी जा सके, वहीं झारखण्ड सरकार इन सभी क्षेत्रों की अनदेखी कर रही है।

जबकि कैपिटल एक्सपेंडिचर में निवेश करने से सिर्फ विकास ही नहीं बढ़ता बल्कि आर्थिक प्रभाव तीन गुना बढ़ता है। रोज़गार का सृजन होता है, किसानों के उत्पादन की मांग बढ़ती है और लघु उद्योगों के लिये बेहतर सुविधाएं होती है। किंतु झारखण्ड सरकार की वित्तीय मामलों में अक्षमता के कारण झारखण्ड की जनता विकास के अभाव में जी रही है।

उन्होंने कहा कि इस सरकार की सारी प्राथमिकताएं ही गलत हैं। कैपिटल आउटले जिसके अंतर्गत विकासशील योजनाओं की फंडिंग होती है, उसे भी घटा दिया गया है। एस्टेब्लिशमेंट एक्सपेंडिचर जिसमें वेतन, पेंशन आदि पर होने वाले खर्चे शामिल हैं, उसे बढ़ा दिया गया है, जो तुलनात्मक रूप से हमारे पड़ोसी राज्यों से 10 प्रतिशत से ज्यादा है। झारखण्ड सरकार पर इस फिजूल खर्ची से कर्ज बढ़ता जा रहा है।

*जनकल्याण की योजनाओं में विफल रही है हेमन्त सरकार*

उन्होंने कहा कि सभी वर्गों हेतु हर क्षेत्र में विकास करने में राज्य सरकार विफल रही है।

1.स्वास्थ्य : यह राज्य का विषय है लेकिन केंद्र सरकार ने वर्ष 2021-22 में झारखण्ड को ₹800 करोड़ से अधिक का योगदान दिया। इसके बावजूद राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बेहद खराब है। नीति आयोग के वर्ष 2019-20 के स्वास्थ्य प्रदर्शन सूचकांक के अनुसार, झारखण्ड 19 बड़े राज्यों में से 13वें स्थान पर है।

2.महिला एवं बाल विकास: केंद्र सरकार द्वारा पोषण अभियान के तहत उपलब्ध करवाई गई ₹75 करोड़ की राशि में से राज्य सरकार सिर्फ ₹22 करोड़ खर्च कर पायी है। यहां तक कि यह सरकार आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाने में नाकाम साबित हुई है।

3.कृषि: केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत वर्ष 2021-22 में राज्य सरकार की लगभग ₹100 करोड़ की हिस्सेदारी तय की है। यह दुखद है कि इस क्षेत्र हेतु स्वीकृत की गई योजनाओं में से केवल 34% योजनाएं पूरी की गई हैं।

4.ग्रामीण विकास: झारखण्ड में वर्ष 2021-22 में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ₹1,000/ करोड़ से अधिक की राशि खर्च की गई, किन्तु सड़क निर्माण का 50% और आवासीय कनेक्टिविटी का केवल 20% लक्ष्य हासिल किया जा सका है।

5.मनरेगा: झारखण्ड में वर्ष 2021-22 में केंद्र सरकार ने ₹900 करोड़ से अधिक का योगदान दिया। राज्य विभाग द्वारा किये गए ऑनग्राउंड ऑडिट में 75% श्रमिक साइट से गायब पाए गए। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य में इस लाभकारी योजना को भ्रष्टाचार और घोटाले का शिकार बना दिया गया है।

6.पेयजल व स्वच्छता: झारखण्ड में लगभग 19% ग्रामीण परिवारों को ही नल का पानी उपलब्ध है। देश के सभी राज्यों व केंद्र शाषित प्रदेशों में नल कनेक्शन के मामले में झारखण्ड सबसे नीचे के 3 नामों में से एक है।

7.बिजली: बिजली के प्रबंधन में झारखण्ड सरकार का प्रदर्शन बेहद खराब है। बिजली कंपनियों की वार्षिक रेटिंग में झारखण्ड की बिजली कंपनी देश की बिजली वितरण कंपनियों में 41 में से 37 वें स्थान पर है। अक्टूबर 2021 तक झारखण्ड पर डीवीसी का हजारों करोड़ का बकाया था, इसकी कीमत राज्य वासियों को कई महीनों तक बिजली आपूर्ति की अनियमितता से चुकानी पड़ी।

*ज़िला खनिज मद (डीएमएफटी) का उपयोग हो पारदर्शी*

अकुशल उपयोग – झारखण्ड संग्रह के मामले में दूसरे नंबर पर है, किन्तु उसके उपयोग में बेहद खराब है। डीएमएफटी संग्रह की ₹6.533 करोड़ की राशि में से केवल 79% आवंटित किया गया और केवल 46% ही उपयोग में लाया गया है।

गलत प्राथमिकताएं- झारखण्ड सरकार द्वारा डीएमएफटी का उपयोग प्रमुख रूप से स्वास्थ्य व स्वच्छता के क्षेत्र में किया गया है, किन्तु राशि उपलब्ध होते हुए भी समाज कल्याण में इसका उपयोग नहीं किया जा रहा है।

पारदर्शिता का अभाव- डीएमएफटी फण्ड की पारदर्शिता एक बहुत बड़ी समस्या है और जनता के पास इसके खर्च की कोई जानकारी नहीं है। इसके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार व कुप्रबंधन की संभावनाएं बढ़ जाती है और जनता के विकास की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं। इसलिए यह अतिआवश्यक है कि इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए और थर्ड पार्टी से इसका निरंतर आंकलन करवाया जाए

उन्होंने कहा कि झारखण्ड की जनता इन सभी प्रश्नों का जवाब मांग रही है। राज्य में विकास रुका हुआ है और जनता त्रस्त है। झारखण्ड की अयोग्य सरकार अपने अपार साधनों का उपयोग करे और राज्यवासियों को विकासशील सुविधाएं उपलब्ध करवाए।

सीमा सिन्हा ब्यूरो प्रमुख।