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विशेषज्ञों ने जताई आशंका, भारत-बांग्लादेश के संबंध मधुर न होने पर चुकानी पड़ सकती है कीमत


ढाका, 22 दिसंबर (हि.स.)। बांग्लादेश में पाकिस्तानपरस्त ताकतों के दुष्प्रचार और उकसावे के बाद भारत के खिलाफ फैल रही नफरत के बीच बिगड़ते संबंधों को देखते हुए विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की है। उनका मानना है कि दोनों ही देशों के जिम्मेदार शख्सियतों को संबंधों को और मधुर करने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे नहीं तो दोनों ही देशों को कीमतें चुकानी पड़ सकती हैं।

इस संबंध में हिन्दुस्थान समाचार ने कई विद्वतजनों से बात की है। विशेष वार्ता में बांग्लादेश इस्लामी एक्य जोट के चेयरमैन मिस्बाहुर रहमान चौधरी ने बताया कि 2001 में बांग्लादेश चुनाव के समय नौकरशाही के सुझाव पर भाजपा ने बीएनपी जमात का समर्थन किया था, जो गलत निर्णय था। हमें लगता है कि केवल सरकारी तंत्र के जरिए संपर्क के बजाय पीपल टू पीपल टॉक को ज्यादा महत्व देना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो पाकिस्तान परस्तों को मौका मिलेगा। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राष्ट्रपति होने के बावजूद जब बांग्लादेश के छोटे से छोटे राजनीतिक दल के छोटे से छोटे नेताजी उनसे मिलने के लिए जाते थे तो वह मुलाकात करते थे। उन्होंने कहा कि जिस तरह से 26 मार्च को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बांग्लादेश सफर के दौरान कट्टरपंथियों ने विरोध किया था, वह नहीं करते अगर भाजपा के संबंध बांग्लादेश के बाकी राजनीतिक दलों से भी बेहतर होते। तब पाकिस्तानपरस्त ताकत ऐसे प्रदर्शनों को हवा नहीं दे पाते। उन्होंने कहा कि हमारे जैसे लोग जो सेकुलर हैं और सभी धर्मों का सम्मान करते हैं वे भारत-बांग्लादेश के बीच पीपल टू पीपल टॉक को बढ़ावा देने के लिए काम करना चाहते हैं।

उन्होंने कहा, “भारतीय नौकरशाही हममें से उन लोगों को भी भारत सरकार में शामिल नेतृत्व से दूर रख रही है, जो उदार इस्लामी समूह हैं और उदार हिंदू, बौद्ध और ईसाई संगठन दोनों देशों के लोगों के बीच संबंध बनाने के लिए काम कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि चीन के उइगर प्रांत में मस्जिदों को गिराकर शौचालय बनाए जा रहे हैं। मुसलमानों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है, उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है और किडनी तक बेची जा रही है, लेकिन बांग्लादेश के इस्लामिक पंडितों को कोई फर्क नहीं पड़ता। इसकी वजह है कि बांग्लादेश में केवल और केवल भारत के खिलाफ जहर घोला जा रहा है।

अगले वर्ष बांग्लादेश में भी करेंगे अंतरराष्ट्रीय सूफी एकता रैली : सैयद सैफुद्दीन
सूफी विचारधारा को मानने वाले अल-हसानी अल-मैजभंडारी के अध्यक्ष प्रिंस सैयद सैफुद्दीन अहमद ने कहा कि विश्व सूफी सम्मेलन 2016 में दिल्ली में आयोजित किया गया था। सम्मेलन में मुख्य अतिथि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। मैं बांग्लादेश से उस सम्मेलन में शामिल हुआ था। उन्होंने बताया कि मैं 2022 में बांग्लादेश में भी एक अंतरराष्ट्रीय सूफी एकता रैली आयोजित करने की तैयारी कर रहा हूं। बांग्लादेश और भारत के प्रधानमंत्रियों सहित दुनियाभर के उदार धार्मिक नेताओं और राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया जाएगा। वर्तमान में लोग राजनीतिक नेताओं की तुलना में धार्मिक नेताओं को अधिक महत्व देते हैं। इसलिए, भारत-बांग्लादेश के लोगों से लोगों के बीच संबंध बनाने के लिए, विद्वानों (इस्लामी विद्वानों), उलमा (इस्लामी प्रचारकों) को साथ लेना आवश्यक है।
दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक व शैक्षिक संबंध बढ़ाना जरूरी: शहरयार कबीर
वर्ष 1971 के घातक दलल निर्मूल समिति के अध्यक्ष लेखक-पत्रकार शहरयार कबीर ने कहा कि भारत-बांग्लादेश के लोगों से लोगों के बीच संबंध बनाने के लिए, दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और शैक्षिक संबंधों को बढ़ाने की आवश्यकता है। बांग्लादेश के लोग भारत को बेहतर तरीके से जान पाएंगे। जमात-बीएनपी भारत को एक हिंदू राज्य के रूप में दुष्प्रचारित करता है। भारत में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को बांग्लादेश में फैलाया जाता है। हमें बांग्लादेश के लोगों को सच्चाई से अवगत कराने के लिए व्यवस्था करनी होगी।
भाजपा को मुस्लिम विरोधी बताकर किया जा रहा प्रचारित: पलाश कांति दे
दोनों देशों के लोगों के बीच बेहतर संबंधों के बारे में बांग्लादेश के हिंदू नेता पलाश कांति डे ने कहा कि भाजपा को बांग्लादेश में उदार धार्मिक संगठनों के नेताओं के साथ अपने संपर्क बढ़ाने की जरूरत है। क्योंकि भाजपा को मुस्लिम विरोधी बताकर प्रचारित किया जा रहा है। सच बांग्लादेश के नागरिकों को बताया जाना चाहिए।