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भोपाल में अक्षय तृतीया पर भगवान परशुराम की 21 फीट ऊंची प्रतिमा का होगा अनावरण


भोपाल, 02 मई (हि.स.)। भगवान परशुराम के जन्म को लेकर भले ही कई मान्यताएं हों और देश के हर कोने में उनके मंदिर हों लेकिन देश के ह्रदय राज्य मध्य प्रदेश में भगवान परशुराम के जन्मोत्सव यानी अक्षय तृतीया पर राजधानी भोपाल में उनकी सबसे बड़ी प्रतिमा का अनावरण होने जा रहा है। यहां के प्राचीन गुफा मंदिर में भगवान परशुराम की 21 फीट ऊंची अष्टधातु की प्रतिमा का अनावरण तीन मई को किया जाएगा। अनावरण आयोजन की अध्यक्षता जूना पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि जी महाराज करेंगे।

ग्यारह सौ ब्राह्मण करेंगे एक साथ स्वस्तिवाचन: इस संबंध में पूर्व महापौर आलोक शर्मा का कहना है कि कार्यक्रम सुबह साढ़े छह बजे से आरंभ हो जाएगा। सर्वप्रथम देव पूजन, प्राण प्रतिष्ठा, आह्वान होगा। सुबह के समय सात बजे से दुर्गा मंदिर लालघाटी से कलश यात्रा आरंभ होकर गुफा मंदिर जाएगी। 5100 महिलाएं इस यात्रा में सिर पर कलश रखकर चलेंगी। कलश यात्रा के मंदिर पहुंचते ही भजनों की भावमय प्रस्तुति के साथ ही ग्यारह सौ ब्राह्मण स्वस्तिवाचन करेंगे।

शुभ मुहूर्त में 500 बच्चों का जनेऊ संस्कार भीः आलोक शर्मा ने बताया कि इसी समय में जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज भगवान परशुराम की विशाल प्रतिमा का अनावरण करेंगे, जिनके साथ महंत रामप्रवेश दास महाराज, अन्य संत, महात्मागण और विशेष तौर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुरेश पचौरी उपस्थित रहेंगे। अनावरण के बाद पूज्य स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज के आशीष वचन होंगे। साथ में 500 बच्चों का जनेऊ संस्कार सम्पन्न कराया जाएगा।

शर्मा का कहना है कि शाम को आठ बजे से अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है। इसमें डॉ. विष्णु सक्सेना, गीतकार (अलीगढ़), डॉ. अनु सपन गीत-गजल (भोपाल), सुमित मिश्रा ओज (ओरछा), डॉ शिवा त्रिपाठी कवियित्री (बस्ती, उत्तर प्रदेश), तेज नारायण, बेचैन हास्य-व्यंग्य (मुरैना), मुन्ना बैटरी हास्य (मंदसौर), प्रख्यात मिश्रा वीर रस (लखनऊ) एवं अभिषेक अरजरिया ओज कवि (छतरपुर) अपनी भक्तिमय एवं समसामयिक रचनाओं का पाठ करेंगे।

चिरंजीवी हैं भगवान परशुराम: शास्त्रों में भगवान परशुराम की गिनती महर्षि वेदव्यास, अश्वत्थामा, राजा बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, ऋषि मार्कंडेय सहित उन आठ अमरचिरंजीवियों में होती है जिन्हें कालांतर तक अमर माना गया है। वे श्रीराम के काल में भी थे और श्रीकृष्ण के काल में भी। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तप की जगह थी और अंतत: वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्यारत होने के लिए चले गए थे। मान्यता है कि पराक्रम के प्रतीक भगवान परशुराम का जन्म छह उच्च ग्रहों के योग में अक्षय तृतीया पर हुआ था, इसलिए वह तेजस्वी, ओजस्वी और वर्चस्वी महापुरुष बने।

जन्म स्थान को लेकर हैं अलग-अलग मान्यताएं: भृगुक्षेत्र के शोधकर्ता साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार परशुराम का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के बलिया के खैराडीह में हुआ था। उन्होंने अपने शोध और खोज में अभिलेखिय और पुरातात्विक साक्ष्यों को प्रस्तुत किया हैं। कौशिकेय अनुसार उत्तर प्रदेश के शासकीय बलिया गजेटियर में इसका चित्र सहित संपूर्ण विवरण मिल जाएगा। 1981 ई. में बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. केके सिन्हा की देखरेख में हुई पुरातात्विक खुदाई में यहां 900 ईसा पूर्व के समृद्ध नगर होने के प्रमाण मिले थे। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहर पाण्डुलिपि संरक्षण के जिला समन्वयक श्रीकौशिकेय द्वारा की गई इस ऐतिहासिक खोज से वैदिक ॠषि परशुराम की प्रामाणिकता सिद्ध होने के साथ-साथ इस कालखण्ड के ॠषि-मुनियों वशिष्ठ, विश्वामित्र, पराशर, वेदव्यास के आदि के इतिहास की कड़ियां भी सुगमता से जुड़ जाती है।

एक अन्य मान्यता है कि मध्यप्रदेश के इंदौर के पास स्थित महू से कुछ ही दूरी पर स्थित जानापाव की पहाड़ी पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। यहां पर परशुराम के पिता ऋर्षि जमदग्नि का आश्रम था। कहते हैं कि प्रचीन काल में इंदौर के पास ही मुंडी गांव में स्थित रेणुका पर्वत पर माता रेणुका रहती थीं। एक तीसरी मान्यता अनुसार छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में घने जंगलों के बीच स्थित कलचा गांव में स्थित एक ऑर्कियोलॉजिकल साइट है जिसे शतमहला कहा जाता है।

मान्यता है कि जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका इसी महल में रहती थीं और भगवान परशुराम को जन्म दिया था। कलचा गांव देवगढ़ धाम से महज दो किलोमीटर दूर है और उस पूरे क्षेत्र में ऋषि-मुनियों के इतिहास से जुड़े कई अवशेष बिखरे पड़े हैं। हरे-भरे जंगलों और पहाड़ों से घिरा छत्तीसगढ़ का सरगुजा क्षेत्र प्राचीन काल के दंडकारण्य का हिस्सा है। इसके साथ ही कुछ लोगों की मान्यता है कि उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर के जलालाबाद में जमदग्नि आश्रम से करीब दो किलोमीटर पूर्व दिशा में हजारों साल पुराने मन्दिर के अवशेष मिलते हैं जिसे भगवान परशुराम की जन्मस्थली कहा जाता है।