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ब्याज दरों में वृद्धि आरबीआई का समय पर लिया गया सटीक नीतिगत हस्तक्षेप: डॉ. सुधांशु


-मांग और आपूर्ति दोनों तरफ से मूल्य वृद्धि का दबाव हो तो मौद्रिक नीति की सक्रियता आवश्यक हो जाती

-दो साल तक आरबीआई ने अर्थव्यवस्था में विकास को समर्थन देने के लिए ब्याज दरों को रिकॉर्ड निचले स्तर पर रखा

पटना, 05 मई (हि.स.)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बीते दिन ब्याज दरों में वृद्धि की है। आरबीआई के ब्याज दरों में वृद्धि को लेकर प्रमुख अर्थशास्त्री एवं सेंटर फॉर इकोनॉमिक पालिसी एंड पब्लिक फाइनेंस, पटना के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ सुधांशु कुमार ने इसे समय पर लिया गया सटीक नीतिगत हस्तक्षेप बताया है।

डॉ सुधांशु कुमार ने विशेष बातचीत में कहा कि तात्कालिक चुनौतियों से परे अगर हम देखें तो मांग आधारित मुद्रास्फीति में वृद्धि के नियंत्रण में मौद्रिक नीति की भी भूमिका है। इसके तहत अर्थव्यवस्था में ब्याज दर और वित्तीय तरलता प्रबंधन की जिम्मेवारी भारतीय रिज़र्व बैंक के पास है। इसी को देखते हुए देश में मुद्रास्फीति प्रबंधन के लक्ष्य भारतीय रिज़र्व बैंक को दिया गया है। इसके तहत पूर्व निर्धारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में वृद्धि की सीमा दो से छह प्रतिशत निर्धारित की गयी है।

मुद्रास्फीति का इस सीमा से बाहर होने पर भारतीय रिजर्व बैंक की जवाबदेही बनती है की समुचित कारण देश को बताए। दो साल तक, आरबीआई ने अर्थव्यवस्था में विकास को समर्थन देने के लिए ब्याज दरों को रिकॉर्ड निचले स्तर पर रखा। परंतु जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था सामान्य होती है, आपूर्ति की तुलना में तेजी से बढ़ती मांग के बारे में चिंता भी बढ़ रही है, जिससे मांग आधारित -मुद्रास्फीति बढ़ रही है।

इसके अलावा वैश्विक मुद्रास्फीति भी एक चिंता का विषय है। रूस-यूक्रेन संकट के कारण पेट्रोलियम के अलावे खाद्य तेल, धातु और उर्वरक की कीमतें अन्य वस्तुओं के भी उत्पादन लागत को बढ़ा रही हैं। यहां ध्यान देने की बात है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सतत और समावेशी विकास के पथ पर दृढ़ बनाए रखने के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित किया जाना आवश्यक है।

इस प्रकार अब जब मांग और आपूर्ति दोनों तरफ से मूल्य वृद्धि का दबाव हो तो मौद्रिक नीति की सक्रियता आवश्यक हो जाती है। वर्तमान में नीतिगत ब्याज दरों में परिवर्तन को इस नजरिये से देखने की जरूरत है । लगभग सभी बड़ी अर्थव्यवस्था में ब्याज में वृद्धि देखने को मिलेगी ।

डॉ. सुधांशु ने कहा कि जब महामारी के कारण बाजार में मांग कम हो गई थी, तब दुनियाभर के सारे सेंट्रल बैंकों ने ब्याज घटाकर कैपिटल कॉस्ट कम किया, ताकि डिमांड को आर्टिफिशियली बूस्ट किया जा सके। यह आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए तत्कालीन हालात में जरूरी था। ध्यान देने की बात है की कि कोरोना महामारी के बाद लगभग सारी अर्थव्यवस्था में ब्याज दरें रिकॉर्ड कम स्तर पर लाई गई थीं।

हालांकि, अब हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। महंगाई का दबाव बढ़ने के बाद तमाम सेंट्रल बैंक कम ब्याज दर के दौर से बाहर निकलने लगे हैं। फेडरल रिजर्व इसकी शुरुआत पहले ही कर चुका है। इसके बाद बैंक ऑफ जापान, बैंक ऑफ इंग्लैंड, रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया समेत कई सेंट्रल बैंक ब्याज दरें बढ़ा चुके हैं। फेडरल रिजर्व अब दूसरी बार ब्याज दर बाधा चुका है। हालांकि, ब्याज में वृद्धि से कर्ज की कीमत बढ़ जाती है और उन लोगों पर बोझ कुछ हद तक बढ़ जायेगा जो कार लोन या होम लोन की ईएमआई भर रहे हैं।

रेपो रेट बढ़ने के बाद बैंक लोन का ब्याज बढ़ाएंगे, जिससे अंतत: ईएमआई बढ़ जाएगी। फिर भी ध्यान देने की बात है की नियंत्रित महंगाई की स्थिति सस्ते ब्याज पर कर्ज की तुलना में आम लोगों के लिए बेहतर है। उन्होंने कहा कि होम लोन या कार लोन की ईएमआई भरने वालों का हिस्सा कुल आबादी में बहुत कम है। रिजर्व बैंक के रेट हाइक से ऐसे सीमित लोगों के पॉकेट पर असर होगा।

दूसरी ओर महंगाई एक ऐसा अदृश्य टैक्स है, जो हर कोई भरता है। कम आय से ले कर, जो लक्जरी जीवन जी रहे हैं, वह भी इसकी कीमत चुकाते है। अब अगर आरबीआई के इस एक्शन से महंगाई नियंत्रित हो जाती है, तो लोन महंगा होने के बाद भी बड़ी आबादी के लिए बेहतर स्थिति होगी।

प्रोफेसर सुधांशु ने कहा कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह भी कहा है की महंगाई पर नियंत्रण होने के बाद पुनः आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय तरलता और कम ब्याज दर का दौर जरी रह सकता है। भू-राजनीतिक संघर्षों और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच देश में वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में वृद्धि हुई है। कमोबेश यही स्थिति विश्व के अन्य कई देशों में भी है।

यह वर्तमान में असामान्य परिस्थिति के बीच उत्पन्न चुनौती है। बढ़ती महंगाई के पीछे कई कारण जिम्मेवार माने जा सकते हैं, जिसमे नियति (luck) के अतिरिक्त मांग और आपूर्ति में असंतुलन और फिर इनका नीतिगत स्तर पर प्रबंधन प्रमुख है।इस मुद्दे पर आम चर्चा में आने वाले प्रमुख कारण हैं, यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि, माइक्रोचिप जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण सामानों की कमी, वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादों की आपूर्ति में कमी, इत्यादि जैसे बिंदु जिनके जड़ में मूलतः आपूर्ति श्रृंखला का प्रभावित होना माना जा रहा है।

दूसरी तरफ कोरोना संकट के पश्चात अर्थव्यवस्था में आई तेज रिकवरी और फिर तेजी से बढती अर्थव्यवस्था को मांग में वृद्धि के संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसे में वर्तमान में मूल्यवृद्धि की जड़ विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के लिए अलग-अलग मांग अथवा आपूर्ति दोनों में असंतुलन से है।

उल्लेखनीय है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को रेपो रेट को 0.40 फीसदी बढ़ाकर 4.40 फीसदी कर दिया है। रेपो रेट में अगस्त 2018 से कोई बदलाव नहीं हुआ था। रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर भारत में वाणिज्यिक बैंक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से पैसा उधार लेते हैं।