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बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने के पक्ष में थे केएस सुदर्शन


-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक केएस सुदर्शन की जयंती पर विशेष

वाराणसी, 18 जून (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पांचवें सरसंघचालक कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन (केएस सुदर्शन) की जयंती पर शनिवार को उन्हें याद किया गया। प्रात:कालीन शाखा में स्वयंसेवकों ने उन्हें नमन कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

स्वयंसेवकों ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को याद किया। मूलरूप से तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली (मैसूर) ग्राम के निवासी सुदर्शन जी की जयंती को लेकर स्वयंसेवकों में भी उत्साह है। सुदर्शन जी ज्ञान के भंडार, अनेक विषयों एवं भाषाओं के जानकार तथा अद्भुत वक्तृत्व कला के धनी थे। किसी भी समस्या की गहराई तक जाकर, उसके बारे में मूलगामी चिंतन कर उसका सही समाधान ढूंढ निकालना उनकी विशेषता थी। पंजाब की खालिस्तान समस्या हो या असम का घुसपैठ विरोधी आंदोलन, अपने गहन अध्ययन तथा चिंतन की स्पष्ट दिशा के कारण उन्होंने इनके निदान के लिए ठोस सुझाव दिए। नौ साल की उम्र में उन्होंने पहली बार संघ की शाखा में भाग लिया। उन्होंने वर्ष 1954 में जबलपुर के इंजीनिरिंग कॉलेज से दूरसंचार विषय बी.ई. की डिग्री ली। 23 साल की उम्र में संघ के प्रचारक बने। सर्वप्रथम उन्हें रायगढ़ भेजा गया। सुदर्शन जी संघ कार्यकर्ताओं के बीच शारीरिक प्रशिक्षण के लिए जाने जाते थे। वह स्वदेशी की अवधारणा में विश्वास रखते थे। समरसता और सद्भाव के लिए अपने कार्यकाल के दौरान वह ईसाई और मुस्लिम समाज से सतत संवाद स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे। उनकी यह सोच थी कि बांग्लादेश से असम आने वाले मुसलमान षड्यंत्रकारी घुसपैठिए हैं। उन्हें वापस भेजा ही जाना चाहिए।

हमारे सुदर्शनजी नामक पुस्तक के मुताबिक सुदर्शनजी को संघ-क्षेत्र में जो भी दायित्व दिया गया उसमें उन्होंने नये-नये प्रयोग किये। 1969 से 1971 तक उन पर अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख का दायित्व था। इस दौरान ही खड्ग, शूल, छुरिका आदि प्राचीन शस्त्रों के स्थान पर नियुद्ध, आसन तथा खेल को संघ शिक्षा वर्गों के शारीरिक पाठ्यक्रम में स्थान मिला। वर्ष 1975 में आपातकाल की घोषणा हुई और पहले ही दिन इंदौर में उनको गिरफ्तार कर लिया गया। उन्नीस माह उन्होंने कारावास में बिताये। आपातकाल समाप्ति के बाद सन् 1977 में उन्हें पूर्वोत्तर का क्षेत्र प्रचारक बनाया गया। क्षेत्र प्रचारक के रूप में उन्होंने वहां के समाज में सहज रूप से संवाद करने के लिए असमिया और बांग्ला भाषा सीखी तथा पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातियों की अलग-अलग भाषाओं का भी ज्ञान प्राप्त किया। कन्नड़, बांग्ला, असमिया, हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी समेत कई भाषाओं में भी वे धाराप्रवाह भाषण दे सकते थे।

चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया को जब लगा कि स्वास्थ्य खराब होने के कारण वे अधिक सक्रिय नहीं रह सकते, तो उन्होंने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से परामर्श कर 10 मार्च, 2000 को अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सुदर्शन जी को यह जिम्मेदारी सौंप दी। नौ वर्ष बाद सुदर्शन जी ने भी इसी परम्परा को निभाते हुए 21 मार्च, 2009 को सरकार्यवाह डॉ. मोहन भागवत को सरसंघचालक का कार्यभार सौंप दिया।

हर कार्य को उत्कृष्टता के साथ करने का हमेशा उनका आग्रह रहता था। 15 सितम्बर, 2012 को रायपुर में दिल का दौरा पड़ने से सुदर्शन जी का निधन हो गया।