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दिनकर ग्राम की दीवारें भी बोलती है ”मानव जब जोर लगाता है पत्थर पानी बन जाता है”


बेगूसराय, 24 अप्रैल (हि.स.)। भारतवासियों के दुख से परेशान होकर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने ”सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” का उद्घोष करने वाले भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को रविवार को 48 वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धापूर्वक याद किया गया। लोगों ने दिनकर जी की कविता और उनकी रचनाओं का पाठ किया लेकिन बिहार के बेगूसराय जिला में स्थित दिनकर ग्राम सिमरिया देश का शायद एकलौता गांव है, जहां की वयोवृद्ध से लेकर छोटे-छोटे बच्चों तक को अपने मिट्टी के लाल राष्ट्रकवि की कविताएं कंठस्थ है।

दिनकर ग्राम सिमरिया के सिर्फ बच्चे ही नहीं, यहां की दीवारें भी कविता बोलती है। दिनकर जी को नमन करते हुए गांव के लोग कहते हैं ”कलम आज उनकी जय बोल”, तो दूसरी ओर बच्चों को यह भी याद है कि ”मानव जब जोर लगाता है पत्थर पानी बन जाता है।” सिमरिया के हर दीवार पर दिनकर जी के कविताओं की पंक्तियां लिखी हुई है, सिमरिया के आसपास के सरकारी विद्यालय हो या निजी विद्यालय, सभी विद्यालय के बच्चों को दिनकर जी की कविता कंठस्थ याद है। सिमरिया के लोगों को गर्व है कि ”हे जन्मभूमि शतावर धन्य तुझ सा ना सिमरिया घाट अन्य।”

”उर्वशी” की पीड़ा से लेकर ”हुंकार” भरते हुए ”कुरुक्षेत्र” की गाथा कहने वाले रामधारी सिंह दिनकर ने गांव सिमरिया में साहित्य चेतना का जो बीज बोया है, वह सदियों तक श्रद्धापूर्वक याद करती रहेगी। दिनकर को जो प्यार सिमरिया दिया जा रहा है, वह प्यार देश के शायद ही किसी अन्य कवियों को मिला होगा। सिमरिया के हजारों लोगों की जुबान पर साक्षात दिनकर सवार हो गए हैं। यहां के बच्चों को दिनकर जी रचित कविता एवं साहित्य की पंक्तियां धाराप्रवाह याद है। सिमरिया में प्रवेश करते ही पंचायत भवन पीतल के पास दिनकर जी मिल जाएंगे। इसके बाद गांव की हर दीवार पर लिखी मिलेगी दिनकर जी के रचनाओं की दो-चार लाइनें।

दीवार पर लिखी लाइनों को देखकर एहसास हो जाता है कि सिमरिया के लोग ही नहीं, यहां की दीवारें भी कविता बोलती है। दिनकर जी के गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू कविताओं को झंकृत करती है। दीवारों पर लिखी हुई रचनाएं पढ़कर गांव के बच्चों को लगता है कि हमारे गांव के महाकवि की यह कविता कहीं ना कहीं जीवन में सफलता के मार्ग को आगे बढ़ने में सीढ़ी का काम करेगी। उन कविताओं को पढ़कर अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। हर संकटों में हर मुसीबतों से लड़ने के लिए, दिनकर की कविता बच्चों में उर्जा प्रदान करती है जैसे ”सच है विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते क्षण एक नहीं धीरज खोते, कांटों में राह बनाते हैं विघ्नों को गले लगाते हैं।”

दिनकर एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनके गांव के बड़े-बुजुर्ग और युवा ही नहीं, नन्हे-मुन्ने चार-पांच साल के बच्चों को भी दिनकर जी की कविताओं की चार से दस लाइन निश्चित तौर पर कंठस्थ है। ”क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो उसको क्या जो दंत हीन विष रहित विनीत सरल हो”। ”हटो ब्योम के मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं दूध-दूध वो वत्स तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं”। ”रे रोक युधिष्ठिर को न यहां जाने दे उनको स्वर्ग धीर पर फिरा हमें गांडीव गदा लौटा दे अर्जुन भीम वीर”। ”श्वानों को मिलता दूध भात भूखे बच्चे अकुलाते हैं मां की हड्डी से ठिठुर चिपक जाड़े की रात बिताते हैं”। ”आरती लिए तू किसे ढूंढता है मूर्ख मंदिरों राज प्रसादों में तहखानों में, देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे देवता मिलेंगे खेतों में खलिहान में”। ”वह प्रदीप जो दिख रहा है झिलमिल दूर नहीं है थक कर बैठ गए क्या भाई मंजिल दूर नहीं”। उपरोक्त के अलावा ढ़ेर सारी कविताएं सिमरिया की कच्ची-पक्की दीवारों पर लिखी हुई है।