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कहीं बेगूसराय में मौजूद एके-47 के दबदबा का एहसास तो नहीं कराता है 4756 ग्रुप


बेगूसराय, 19 सितम्बर (हि.स.)। हिन्दी साहित्य के सूर्य राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जन्म भूमि बेगूसराय इन दिनों राष्ट्रीय उच्च पथ (नेशनल हाइवे-28 एवं 31) पर करीब 30 किलोमीटर तक हुई गोलीबारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है।

इस खौफनाक गोलीकांड को लेकर जब हर तरफ सरकार की किरकिरी होने लगी तो पूरे बिहार की पुलिस ने मिलकर घटना में शामिल चार अपराधियों को गिरफ्तार करने का दावा करते हुए मामले का उद्भेदन करने की बातें कही है। हालांकि भाजपा नेता और पकड़े गए युवकों के परिजन इसे झूठा बताते हुए मामले की सीबीआई या एनआईए जांच की मांग कर रहे हैं लेकिन इस बीच गिरफ्तार युवकों से जुड़े सोशल मीडिया ग्रुप का खुलासा हुआ है, जिसका नाम ही रखा गया है 4756।

47 और 56 नाम बेगूसराय के लिए कोई नई बात नहीं है। देश के सबसे पहले बूथ लूट और जेल ब्रेक कांड को लेकर 1950-60 के दशक से अपराध पटल पर सुर्खियों में रहे बेगूसराय के लिए अति प्रतिबंधित हथियार एके-47 और एके-56 कोई नई बात नहीं है। बिहार में जब लोग एके-47 को देखे भी नहीं थे तो उस समय से आज तक सबसे आधुनिक हथियार माना जाने वाला एके-47 बिहार में सबसे पहले बेगूसराय में ही आया था। कहा जाता है कि आज भी दर्जनाधिक अपराधियों और सफेदपोश के पास बेगूसराय में यह हथियार मौजूद है।

पुलिस इसे भले ही नहीं स्वीकारेगी, लेकिन समय-समय पर उस अत्याधुनिक हथियार की बरामदगी और आपराधिक गिरोहों के बीच होने वाली चर्चा इसके मौजूदगी का एहसास कराता है। आज जब सिरियली गोलीकांड में गिरफ्तार किए गए नवोदित अपराधियों के सोशल मीडिया ग्रुप 4556 की चर्चा तेजी से हो रही है तो यह लाजमी होगा कि लोग जानें एके-47 का उपयोग बेगूसराय में सबसे पहले किसने किया था।

एक मिनट में छह सौ गोलियां बरसाने वाले स्वचालित कलाश्निकोव (एके-47) का आविष्कार 1947 में मिखाइल कलाश्निकोव ने किया था। बिहार में यह हथियार चर्चा में आया 1990 में। जब अंतरराष्ट्रीय लिंक के अपराधी माने जाने वाले अशोक सम्राट ने मुजफ्फरपुर में इससे दनादन गोलियां बरसाई। गोली की बौछार से उस समय का अपराध जगत अचंभित रह गया था और तभी सामने आया यह अति आधुनिक हथियार। कहा जाता है कि मुजफ्फरपुर में बहदरपुर (बेगूसराय) ठाकुरबाड़ी के महंत रामलगन दास और अशोक सम्राट के बीच व्यवसायियों से रंगदारी टैक्स वसूलने को लेकर तकरार हुई थी। जिसमें कि अशोक सम्राट ने अपनी हनक साबित करने के लिए एके-47 से गोलियों की बौछार किया था।

हालांकि रामलगन दास ग्रुप के किसी अपराधी को गोली नहीं लगी, लेकिन यह नया हथियार देखकर सब के सब चौकन्ना हो गए थे। बेगूसराय अपराधियों का गढ़ रहा है, कई कुख्यात अपराधी यहां से निकले हैं। बेगूसराय में 13 सितम्बर को हुई फायरिंग ने एक बार फिर वही दहशत की याद दिला दी जो दो दशक पहले तक यहां दिखा करती थी। बिहार की राजनीति और अपराध हमेशा से ही साथ-साथ चलते आया है। अगर राजनीति पर चर्चा की जाए तो अपराधियों के नाम अपने आप ही सामने आने लगते हैं। खासकर कुछ दशक पहले तक तो बिहार की राजनीति अपराध के इर्द-गिर्द ही घूमती थी।

बिहार का बेगूसराय ऐसा ही जिला है, जिसने अपराध की दुनिया के कई बड़े नामों को जन्म दिया। बेगूसराय में हुए ताजा गोलीबारी कांड ने वह सारे नाम याद दिला दिए और उन्हीं में से एक नाम है अशोक सम्राट। कुख्यात डॉन अशोक सम्राट से उस समय सिर्फ बेगूसराय के लोग ही नहीं, बल्कि आसपास के सभी जिला और राज्य से लेकर नेपाल तक के लोग भी कांपते थे। बिहार में बेगूसराय के अलावा मुजफ्फरपुर, दरभंगा, शिवहर, सीतामढ़ी, कटिहार, वैशाली, मोकामा, लखीसराय, मुंगेर, भागलपुर और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर तक इस नाम की तूती बोलती थी।

वह जमाना था जब राजनीति में बड़े-बड़े अपराधियों का दखल हुआ था, अपराधी सरकार गिराने और बनाने की ताकत रखते थे। 1970 के दशक में बेगूसराय में जहां तस्कर सम्राट कामदेव सिंह का बोलबाला था, तो वहीं 1990 का दशक आते-आते अशोक सम्राट ने वैसी ही जगह बना लिया। बेगूसराय के बरौनी में एक किसान के घर में अशोक का जन्म हुआ था। पिता ने अच्छी तरह पढ़ाई लिखाई करवाया, अशोक ने दो विषय में एम.ए. (पोस्ट ग्रेजुएट) करने के बाद दारोगा की नौकरी करने का निर्णय लिया। इसमें चयन के लिए दरभंगा गया, लेकिन तभी खबर मिली कि उसके खास दोस्त रामविलास ने जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश किया है। कहा जाता है कि अशोक दरभंगा को छोड़कर तुरंत अपने दोस्त के घर पहुंच गया तथा दुखी होकर खुद को गोली मार ली। दोनों दोस्त को अस्पताल ले जाया गया, जहां जिंदगी और मौत की जंग के बाद दोनों दोस्तों को नई जिंदगी नसीब हुई।

इसके कुछ ही वर्षों बाद कम्युनिस्ट विचारधारा के कारण दोनों दोस्तों के बीच ऐसी दुश्मनी हुई कि अशोक ने अपराध का रास्ता चुन लिया और बन गया अशोक सम्राट। बिहार का यह वो दौर था जब चुनाव आते ही अपराधियों की डिमांड काफी बढ़ जाती थी। बूथ कैप्चरिंग और हत्या सहित सभी काले काम इन्हीं अपराधियों की मदद से पूरे होते थे और इसमें बड़ा नाम बन गया था अशोक सम्राट। बरौनी से लेकर गोरखपुर तक अशोक का आतंक फैला था, बरौनी रिफाइनरी और रेलवे के ठेका पर अशोक सम्राट का ही कब्जा था। उसी दौरान मोकामा के सूरजभान सिंह (बलिया के अंतिम सांसद) नाम का एक दूसरा माफिया भी आ गया था, जिससे हमेशा अशोक सम्राट की टक्कर रही। रेलवे ठेका को लेकर सूरजभान और अशोक सम्राट में अक्सर गैंगवार चलती और फिर होता था मौत का खूनी खेल।

अशोक सम्राट ने 40 से ज्यादा मुठभेड़ में इसने खूनी खेल खेला और कई लोगों की जान ले ली। 1980 के दशक में अशोक सम्राट ने अपने गैंग का काफी विस्तार कर लिया था। उस समय इस गैंग के पास सभी तरह के हथियार थे, सूत्रों की मानें तो खालिस्तानियों की मदद से अशोक सम्राट ने अपने हथियारों के जखीरे में कई एके-47 शामिल कर लिया, इसी कारण वह सूरजभान जैसे दूसरे माफियाओं पर भारी पड़ रहा था। राजनीति में भी उसका अच्छा खासा दखल था, किस उम्मीदवार को जिताना है और किसको हराना है, यह अशोक सम्राट तय करता था। बूथ कैप्चरिंग के अलावा जबरन वोटिंग करवाना उसके काम में शामिल था और इसलिए उसे राजनैतिक पार्टियों की तरफ लगातार संरक्षण मिल रहा था।

कहा जाता है कि 1990 के दशक में इसकी रंगदारी के साम्राज्य मुजफ्फरपुर पर बहदरपुर महंत राम लगन दास ने जब कड़ी टक्कर दी, तो इसने धोखे से दोस्ती कर रामलगन दास को अपने वैशाली जिला स्थित नवनिर्मित आवास पर गृह प्रवेश के बहाने बुला लिया तथा वहां जूस में जहर मिलाकर मदहोश करने के बाद इलाज के लिए ले जाते समय गांधी सेतु पर से गंगा नदी में फेंकने के दौरान इसने रामलगन दास एवं उसके गाड़ी के पीछे चल रहे गुर्गों पर एके-47 से दिनदहाड़े ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई थी। फिलहाल अब अशोक सम्राट भले ही नहीं रहा, लेकिन बेगूसराय में 4756 ग्रुप की चर्चा होते ही बिहार में उपयोग किए गए एके-47 की चर्चा जरूर जोर-शोर से हो रही है।