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एफडीआर टेक्नॉलॉजी से पुरानी सड़कें होंगी नयी


-उप्र में पांच हजार किलोमीटर सड़कें बनाने का खाका तैयार

-टेंडर प्रक्रिया पूरी, कई जिलों में सड़कों का निर्माण कार्य शुरू

लखनऊ, 30 जुलाई (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्र की जर्जर सड़कें आधुनिक तकनीक से बनाई जाएंगी। चार जिलों में पालयट प्रोजेक्ट के रूप में परीक्षण करने बाद अब प्रदेश के सभी जिलों में एफडीआर (फुल डेफ्थ रिक्लेमेशन) तकनीक से सड़कों का निर्माण किया जाएगा। पहले चरण में इस तकनीक का उपयोग सड़कों के उच्चीकरण व मरम्मत कार्य के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके तहत पांच हजार 348 किलोमीटर की 687 सड़कों के निर्माण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे दिया गया है। कई जिलों में सड़कों का निर्माण भी शुरू हो गया है।

देश में ग्रामीण अंचल की सड़कों का निर्माण इस तकनीक के माध्यम से सबसे पहले उत्तर प्रदेश ने शुरू किया है। योगी सरकार-01 में इस तकनीक पर ग्राम्य विकास विभाग में अध्ययन शुरू हुआ। तकनीक का इस्तेमाल करने की बात आई तो ग्रामीण अभियंत्रण विभाग तो सड़कें बनाने को राजी हो गया लेकिन लोक निर्माण विभाग(पीडब्ल्यूडी) इस पर राजी नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि ग्राम्य विकास विभाग की सड़कें ग्रामीण अभियंत्रण और लोक निर्माण विभाग बनाते हैं।

पेंच फसने के बाद दोनों विभागों के अफसरों ने मुख्यमंत्री योगी के समक्ष प्रस्तुतीकरण दिया। मुख्यमंत्री ने तकनीक की खूबियां समझीं और लागू करने के निर्देश दिए। चार जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया गया। परीक्षण सफल रहा। इसके बाद प्रदेश भर की पांच हजार किलोमीटर से अधिक लंबाई की 687 सड़कों को चिन्हित किया गया है। इन मार्गों के निर्माण के लिए टेण्डर प्रक्रिया पूरी हो गयी है। कई जिलों में इस आधुनिक तकनीक से सड़कों का निर्माण शुरू हो गया है।

दूसरों राज्यों को दिया प्रशिक्षण

उप्र एफडीआर तकनीक से अपनी सड़कें तो बना ही रहा है, साथ में दूसरे राज्यों को भी तकनीक का प्रशिक्षण दे रहा है। विभाग के अधिकारी बताते हैं कि राजस्थान, मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्य उप्र में आकर प्रशिक्षण ले चुके हैं। विभाग के मंत्री व प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अधिकारियों को सभी चिन्हित सड़कों के निर्माण में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।

आधुनिक तकनी से बनी संड़कों की आयु अधिक

इस तकनी से सड़क निर्माण में कुछ सीमेंट में विशेष प्रकार के केमिकल को मिलाकर एक पर्त बिछाई जाती है। विशेष प्रकार की मशीन से खुदाई करके पुरानी सड़क की गिट्टी और पत्थर का पुन: इस्तेमाल कर लिया जाता है। दोबारा से गिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती है। गिट्टी की जरूरत वहीं पड़ सकती है, जहां पर सड़क पूरी तरह से समाप्त होकर गढ्ढे में तब्दील हो गयी है। बताया जा रहा है कि एफडीआर तकनीक से बनने वाली सड़कों की सामान्य आयु 10 वर्ष होगी। डामर या परम्परागत तरीके से निर्मित सड़कें आमतौर पर बरसात के दिनों में टूट जाती हैं। एफडीआर से बनी सड़कों की खासियत है कि बारिश में भी जस की तस बनी रहेंगी। बनाने में भी कम खर्च आएगा। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।