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अग्निपथ योजना के समर्थन में मुसलमानों की सोशल मीडिया पर मुहिम


– गली-मोहल्लों में बेकार बैठने के बजाय इस योजना का लाभ उठाने की अपील

नई दिल्ली, 25 जून (हि.स.)। सेना में युवाओं की भर्ती के लिए केंद्र सरकार की तरफ से लाई गई नई योजना ‘अग्निपथ’ को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हुए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी इसको लेकर काफी नकारात्मक मुहिम चलाई गई लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि सीएए और एनआरसी जैसे कानून पर सरकार का मुखर विरोध करने वाले देश के मुसलमानों की खासी तादाद इसके समर्थन में नजर आ रही है। ऐसा सोशल मीडिया पर अग्निपथ योजना के समर्थन में लगातार सामने आ रही पोस्ट को देखकर कहा जा सकता है।

मुसलमानों के जरिए सोशल मीडिया पर पहले दिन से ही ‘अग्निपथ’ योजना के समर्थन में पोस्ट डाली जा रही है। अलबत्ता पहले इसकी संख्या कम थी लेकिन अब दिन-प्रतिदिन ऐसी पोस्ट्स की तादाद बढ़ती जा रही है। हालांकि कुछ छुटपुट विरोधी पोस्ट भी सामने आ रही हैं लेकिन अधिकतर लोग चाहते हैं कि मुस्लिम युवा 10वीं और 12वीं पास करके अग्निपथ योजना के तहत सेना में भर्ती हों और देश की सेवा करें। इस पूरे मामले में सबसे बड़ी बात जो सामने निकल कर आई है वह यह है कि अभी तक किसी भी बड़े मुस्लिम संगठन की तरफ से ना तो अग्निपथ योजना का विरोध किया गया है और ना ही इसका समर्थन किया गया है। बड़े मुस्लिम संगठनों ने अब इस मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है।

सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर किसी भी मुद्दे पर लोग खुलकर अपनी राय का व्यक्त करते हैं। सेना में भर्ती की नई योजना अग्निपथ पर भी लोग अपनी विचार व्यक्त कर रहे हैं। सोशल मीडिया के सबसे बड़े प्लेटफार्म फेसबुक पर अग्निपथ योजना के विरोध और पक्ष में पोस्ट करने का सिलसिला अभी भी जारी है। फेसबुक और ट्विटर पर बड़ी संख्या में मुस्लिम युवा और पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी वर्ग उन मुस्लिम छात्रों से जिन्होंने इस वर्ष 10वीं और 12वीं पास की है, उनसे अग्निपथ योजना के तहत सेना में भर्ती होने के लिए आवेदन करने की अपील कर रहा है।

सोशल मीडिया पर चलने वाली इस तरह की पोस्ट में जबरदस्त तर्क-वितर्क भी देखने को मिल रहे हैं। अधिकांश पोस्टों में यह देखा गया है कि युवाओं से कहा जा रहा है कि जिस आयु में वह गली मोहल्लों में बैठ कर अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, उस आयु में उन्हें अग्निपथ योजना के तहत नौकरी देने का प्रस्ताव किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर दिए जा रहे सुझावों में यह भी कहा जा रहा है कि मुसलमानों का एक बड़ा तबका जोकि मजदूर वर्ग और रोजमर्रा के कामों में लगा हुआ है, उनके बच्चे अधिक ड्रॉपआउट होते हैं। उनके ड्रॉपआउट का सिलसिला आठवीं, नौवीं, दसवीं ग्यारहवीं और बारहवीं में अधिक होता है। इस तबके के बहुत कम बच्चे उच्च शिक्षा के लिए कॉलेज या विश्वविद्यालय आदि का सफर कर पाते हैं। ऐसे में दसवीं या बारहवीं करने वाले छात्रों को अगर सही तरीके से प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें अच्छी ट्रेनिंग और कंपटीशन के लिए अच्छा माहौल उपलब्ध कराया जाए तो वह बड़ी तादाद में अग्निपथ योजना के लिए होने वाली परीक्षा को पास करके नौकरी पा सकते हैं। सोशल मीडिया पर लोग इस तरह की पोस्ट को बड़ी संख्या में शेयर, रिट्वीट और फॉरवर्ड भी कर रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक मैसेज को पहुंचाया जा सके।

गौरतलब है कि इस शुक्रवार को जुमे की नमाज के दौरान कानपुर की दो मस्जिदों से अग्निपथ योजना से मुस्लिम युवाओं के जुड़ने की अपील किए जाने का मामला भी काफी चर्चा में है। इसका भी समर्थन किया जा रहा है और लोगों से अन्य मस्जिदों और संगठनों से भी इस तरह की अपील किए जाने की मांग की जा रही है। सोशल मीडिया पर यह भी कहा जा रहा है कि इस योजना के लाभ अथवा हानि के बारे में मुसलमानों को बहुत कुछ सोचने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मुसलमानों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है बल्कि इससे कुछ लाभ ही प्राप्त होने की संभावना है। उनका तर्क है कि मुसलमान वैसे भी सरकारी नौकरियों में काफी कम हैं। ऐसे में उन्हें इस योजना का लाभ उठाना चाहिए।

सोशल मीडिया पर मुस्लिम संगठनों की इस मुद्दे पर खामोशी की भी चर्चा की जा रही है। कहा जा रहा है कि आखिर क्या वजह है कि यह संगठन मुसलमानों की इस मामले में रहनुमाई करने के बजाय खामोश तमाशाई बने हुए हैं? अगर मुस्लिम संगठनों को लगता है कि यह योजना उनके लिए नुकसानदेह है तो उन्हें इसका विरोध करना चाहिए और मुसलमानों से भी इसके विरोध की अपील करनी चाहिए, न कि खामोश तमाशाई बना रहना चाहिए। मुसलमानों से सम्बंधित सरकार के हर फैसले पर अपनी राय व्यक्त करने वाले ये संगठन आखिर इस बड़े मुद्दे पर खामोश क्यों हैं?

सोशल मीडिया पर यह भी कहा जा रहा है कि बीते तीसरे शुक्रवार को कानपुर और देश के दूसरे अन्य भागों में पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के अपमान के खिलाफ हुए अन ऑर्गेनाइज्ड धरना-प्रदर्शन की वजह से मुसलमानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। कई मुस्लिम युवकों की जान चली गई और कई जख्मी हुए और सैकड़ों की संख्या में मुसलमान इस वक्त जेलों में बंद हैं जिनकी कोई खबर लेने वाला नहीं है। सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि अगर यह धरना-प्रदर्शन किसी संगठन की तरफ से ऑर्गेनाइज तौर पर किया जाता तो इस तरह का मामला सामने नहीं आता।