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अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस पर सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन ने किया कार्यक्रम का आयोजन


बेतिया, 01 मई (हि.स.)।सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन के सभागार सत्याग्रह भवन में अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया।इसमें विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ,बुद्धिजीवियों एवं छात्र छात्राओं ने भाग लिया।

इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय पीस एंबेस्डर सह सचिव सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन डॉ एजाज अहमद अधिवक्ता, डॉ सुरेश कुमार अग्रवाल चांसलर प्रज्ञान अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय झारखंड, अमित कुमार लोहिया, डॉ शाहनवाज अली ,पश्चिम चंपारण कला मंच की संयोजक शाहीन परवीन एवं अल बयान के संपादक डॉ सलाम ने संयुक्त रुप से अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दुनिया भर में विगत वर्षों में कोरोना वायरस संक्रमण, विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं एवं विश्व के अशांत क्षेत्रों में मारे गए श्रमिकों एवं कामगारों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि प्रत्येक वर्ष एक मई को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाता है।136 साल पहले तक दुनिया में मजदूरों के काम की समय-सीमा तय नहीं थी। कामगारों एवं मजदूरों के अधिकारों के लिए अमेरिका के शिकागो में कामगारों एवं श्रमिकों ने शांतिपूर्ण ढंग से आंदोलन किया कामगारों एवं श्रमिकों के लिए कोई नियम-कायदे ही नहीं होते थे।मजदूरों से लगातार 15 घंटे या उससे भी ज्यादा समय तक काम लिया जाता था। उनकी छुट्टियों को लेकर भी कोई व्यवस्था नहीं थी. इसकी वजह से साल 1886 में 1 मई को अमेरिका के शिकागो शहर में एकजुट होकर हजारों मजदूरों ने बड़ा प्रदर्शन किया था।उनकी मांग थी कि मजदूरी का समय 8 घंटे निर्धारित किया जाए. इसके अलावा हफ्ते में एक दिन छुट्टी दी जाए।शिकागो के आंदोलन में लगभग चार श्रमिक शहीद एवं सैकड़ों घायल हुए घायल हुए थे। उन शहीद कामगारों एवं मजदूरों को इस मंच के माध्यम से हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

पूरी दुनिया में वैधानिक रूप से कर्मचारियों, मजदूरों या कामगारों के लिए एक दिन में काम के 8 घंटे तय हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह शिकागो आंदोलन को ही माना जाता है। हफ्ते में एक दिन छुट्टी की शुरुआत भी इस आंदोलन की देन ही मानी जाती है। धीरे-धीरे पूरी दुनिया में एक मई को मजदूर दिवस या कामगार दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत हो गई। दुनिया के कई देशों में एक मई को राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर मनाया जाता है। शिकागो के आंदोलनकारियों ने 4 मई, 1886 आंदोलन किया था। इसके तीन साल बाद 1889 में पेरिस में हुए इंटरनेशनल सोशलिस्ट कॉन्फ्रेंस में बलिदान देने वाले मजदूरों की याद में एक मई के दिन को समर्पित करने का फैसला किया गया।